शाही निर्यात इकाई-8
2021
अप्रैल 2020 में भारत के कर्नाटक राज्य में, जो देश के परिधान निर्माण के सबसे बड़े केन्द्रों में से एक है, न्यूनतम वेतन वृद्धि लागू हो गई। प्रमुख परिधान ब्रांडों के लिए उत्पादन करने वाले कारखाने के मालिकों ने भुगतान करने से इनकार कर दिया। परिणामस्वरूप, एक हजार से अधिक कारखानों के 4,00,000 कपड़ा श्रमिकों को कानूनी न्यूनतम वेतन न देकर धोखा दिया गया।
वैश्विक परिधान उद्योग में डब्ल्यूआरसी द्वारा दर्ज की गई यह सबसे बड़ी और खराब वेतन चोरी है। परिधान ब्रांडों को इस चोरी के बारे में पता था, लेकिन उन्होंने लगभग दो वर्षों तक इसे जारी रहने दिया। डब्ल्यूआरसी गणना के अनुसार जनवरी 2022 तक, कारखानों पर श्रमिकों का सामूहिक रूप से 5 करोड़ 80 लाख डॉलर से अधिक बकाया था।
2022 की फरवरी की शुरुआत में गारमेंट एंड टेक्सटाइल वर्कर्स यूनियन (जीएटीडब्ल्यूयू) द्वारा एक सफल मुकदमे, डब्ल्यूआरसी द्वारा ब्रांडों के साथ महीनों की कोशिशों और श्रम अधिकारों की वकालत करने वालों की बढ़ती संख्या में अपनी आवाज़ उठाने के बाद, भारत के सबसे बड़े परिधान निर्माता, शाही एक्सपोर्ट्स ने घोषणा की कि वह कर्नाटक में अपने सभी 80,000 श्रमिकों को सही न्यूनतम वेतन देना शुरू कर देगा। कम्पनी ने वर्तमान और पूर्व श्रमिकों दोनों को, सभी बकाया का भुगतान करने की भी प्रतिबद्धता जताई। अन्य आपूर्तिकर्ताओं ने भी जल्द ही इसका अनुसरण किया।
2018
डब्ल्यूआरसी की एक जाँच में पाया गया कि शाही एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड (शाही) इकाई-8 की फैक्ट्री (बेंगलुरु, भारत) के प्रबंधन ने श्रमिकों द्वारा अपने मौलिक श्रम अधिकारों के इस्तेमाल के खिलाफ क्रूर दमनकारी प्रतिशोध का एक अभियान चलाया। प्रतिशोध का यह अभियान इस इकाई के कर्मियों के कर्नाटक गारमेंट वर्कर्स यूनियन (केओओजीयू) के साथ संगठित होने और बेहतर कामकाजी परिस्थितियों के लिए याचिका दायर करने के जवाब में हुआ था। यह फैक्ट्री कोलंबिया स्पोर्ट्सवियर के लिए यूनिवर्सिटी लोगो परिधान और बेनेटन, एच एंड एम और एबरक्रॉम्बी एंड फिच के लिए परिधान बनाती है।
शाही भारत की सबसे बड़ी कपड़ा निर्माता कम्पनी है और इसका स्वामित्व आहूजा परिवार के पास है। वर्ष 2018 की शुरुआत में, कम्पनी ने कपड़ा उद्योग में श्रमिकों के लिए न्यूनतम वेतन में निर्धारित वृद्धि को रद्द करने के लिए कर्नाटक राज्य सरकार से सफलतापूर्वक पैरवी की। अप्रैल के अंत और 2018 की शुरुआत में की गई डब्ल्यूआरसी की फैक्ट्री की जाँच में 30 से अधिक शाही श्रमिकों के साक्षात्कार शामिल थे। डब्ल्यूआरसी ने शाही को भारतीय कानूनों, अंतरराष्ट्रीय श्रम मानकों और विश्वविद्यालय व ब्रांड आचार संहिता का उल्लंघन करते हुए पाया। इन उल्लंघनों में शारीरिक पिटाई, जान से मारने की धमकी, लिंग, जाति और धर्म आधारित दुर्व्यवहार, सामूहिक रूप से नौकरी से हटाने की धमकियाँ और 15 श्रमिक कार्यकर्ताओं का कारखाने से निष्कासन शामिल थे।
डब्ल्यूआरसी ने शाही, कोलंबिया स्पोर्ट्सवियर और अन्य ब्रांडों के साथ अपनी जाँच के परिणाम और सिफारिशें साझा कीं और कार्रवाई के लिए दबाव डाला। इसमें निष्कासित श्रमिक नेताओं की बहाली, हिंसा के कारनामों में सीधे तौर पर लिप्त प्रबंधकों की बर्खास्तगी और यूनियन की तत्काल मान्यता शामिल थी। शाही शुरू में इकाई-8 के श्रमिकों को बहाल करने के लिए सहमत हुआ, लेकिन यह सुनिश्चित करने के लिए ज़रूरी बुनियादी कदम उठाने के लिए तैयार नहीं हुआ कि श्रमिक कारखाने में सुरक्षित रूप से लौट पाएं और संगठन की स्वतंत्रता के उनके मौलिक अधिकार का हनन न हो। सार्थक सुधारात्मक कार्रवाई करने में शाही की विफलता को देखते हुए डब्ल्यूआरसी ने अपनी जाँच को सार्वजनिक कर दिया। फिर शाही और उससे जुड़े ब्रांडों पर दबाव बनाने के लिए पर्याप्त मीडिया कवरेज हासिल की और दूसरी ओर कॉलेजिएट लाइसेंसधारी कोलंबिया को प्रेरित करने के लिए विश्वविद्यालय पर दबाव बनाया।
डब्ल्यूआरसी की रिपोर्ट के प्रकाशन के दबाव में, शाही ने 25 जून को श्रमिक संघ के साथ मुलाकात की और एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए, जिसकी प्रमुख शर्तों को जून के अंत तक सफलतापूर्वक लागू किया गया। जिन 15 श्रमिकों को बेरहमी से पीटा गया था, जान से मारने की धमकियाँ दी गई थीं और शाही इकाई-8 की फैक्ट्री से निलम्बित कर दिया गया था, वे बिना किसी घटना या उत्पीड़न के अपनी नौकरी पर लौट आए और उन्हें पिछला बकाया वेतन मिला। डब्ल्यूआरसी के प्रतिनिधियों और खरीदारों ने कारखाने में श्रमिकों की इस वापसी की निगरानी की। शाही ने भी श्रमिक संघ को मान्यता दी, उनसे नियमित बातचीत के लिए सहमति हुआ और हिंसा के लिए ज़िम्मेदार अधिकांश प्रबंधकों और पर्यवेक्षकों को बर्खास्त किया।
परिधान उद्योग की बेहद कम मज़दूरी के कारण अधिकांश कपड़ा श्रमिकों के पास कोविड-19 संकट की घड़ी में कोई बचत नहीं थी। चूंकि परिधान निर्यातक देशों में अधिकांश सरकारें या तो बहुत कम या कोई बेरोज़गारी लाभ प्रदान नहीं करती, इसलिए काम छूटने वाले परिधान श्रमिक व उसके परिवार की तत्काल गरीबी के बीच जो एकमात्र चीज़ होती है, वह है कानूनी रूप से अनिवार्य नौकरी विच्छेद लाभ। यह वह रक़म है जो अधिकांश परिधान श्रमिकों को बर्खास्तगी पर देय होती है।
वर्कर राइट्स कन्सॉर्शियम (डब्ल्यूआरसी) के शोध से पता चलता है कि महामारी के दौरान नौकरी से निकाले गए कई कपड़ा श्रमिकों को कानून, उन ब्रांडों व खुदरा विक्रेताओं के श्रम दायित्वों का उल्लंघन करते हुए, लगभग सभी आवश्यक मुआवज़ों से वंचित रखा गया।
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